कविता

लोकतंत्र मरने मत देना
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हे रे भाई, हे रे साथी।
पुरखों से हासिल आज़ादी।
लोकतंत्र की जलती बाती।
यह बाती बुझने मत देना।
लोकतंत्र मरने मत देना।

सिक्कों के झनकारों में फंस।
ओहदों और अनारों में फंस।
जात धर्म के नारों में फंस।
यह भारत जलने मत देना।
लोकतंत्र मरने मत देना।

पर्वत जंगल माटी पानी।
हंसता बचपन चढ़ी जवानी।
मेहनतकश मजदूर किसानी।
यह हीरा बिकने मत देना।
लोकतंत्र मरने मत देना।

चिकनी चुपड़ी सौगातों में।
उकसाने वाले झांसों में।
ईस्ट इंडिया जस हाथों में,
देश पुनः फंसने मत देना।
लोकतंत्र मरने मत देना।

इस धरती से अपना नाता।
हम बेटें हैं यह है माता।
अपना दाता एक विधाता।
दाता नव बनने मत देना।
लोकतंत्र मरने मत देना।

-धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव संरक्षक मानव सेवा समिति सिखडी गाज़ीपुर

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