कविता (सेठ का कोठिला)

सेठ का कोठिला देखिए
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तिलमिला तिलमिला देखिए,
झूठ का जलजला देखिए।
कत्ल को कह रहा है दवा,
जुल्म का हौसला देखिए।

हुक्म है खास का आम को,
यह किला, वह किला, मकबरा,
छोड़ हर ताज, मुमताज को, सेवकों का विला देखिए।

मानिए साहबों का कथन,
भूख तकदीर का दोष है,
इसलिए मत इसे कोसिए,
पेट में ही जला देखिए।

देखनी है प्रगति आप को,
या दिखानी किसी और को,
लीजिए अग्निपथ की शपथ,
सेठ का कोठिला देखिए।

मूर्खता में भले है मगर,
हम बराबर हुए रोम के,
घर जलाकर खुदी बावरा,
हँस रहा खिलखिला देखिए।

गर बताना है उपलब्धियाँ,
पान जोड़ा दबा साथियाँ,
फिर बता आजकल बैंक में,
लूट का सिलसिला देखिए।

हर तरफ जब निराशा दिखे,
हो तलब एक आशा दिखे,
दो कदम चल इधर से उधर,
बाग कोई फला देखिए।

इश्क का रास्ता है कठिन,
ना बहस है इसे ले कभी,
यह कठिन चाहिए गर सरल,
आँख हमसे मिला देखिए।

पाँव में आबले देखकर,
हारिए मीत हिम्मत नहीं,
जब कभी वो दहकता दिखे,
आप सूरज ढला देखिए।

– धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव संरक्षक मानव सेवा समिति

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